यादें जाने वाले की

आज भैया को गये हुए चौबीसवाँ दिन था। जब से गये हैं हर रात रोते हुए सोना जैसे नियम ही बन गया था । भैया गए ये गम तो था ही पर इससे भी ज्यादा गम अब ये था कि आज तक सपने में भी नहीं दिखे। हर रात कहती भैया आज जरूर दिखना पर वो नहीं दिखे।
आज चौबीस की रात भी गुजर गई आँख खुली तो तीन बज रहे थे वापस सो गई ,अभी तो बहुत समय है दिन निकलने में यह सोचकर।
अचानक ही देखा कि मैं और भैया बाइक से कहीं जा रहे हैं और पास से गुजरते हुए एक कॉलेज कैम्पस मेंबहुत सुंदर बागवानी है खूबसूरत पेड़ हैं और फल और फूल भी बहुत ही खूबसूरत ,इस परिप्रेक्ष्य में एक पेड़ का वर्णन करुंगी क्योंकि वास्तविक जीवन में मैंने ऐसा फल कभी नहीं देखा है । आम के बड़े पेड़ के आकार जैसा एक पेड़ जिस पर पान के आकार का बड़ा सा फल जैसे पान के आकार में प्लेट्स होती हैं और उस में छोटे छोटे कई फलनुमा आकृतियां, वास्तव में उनकी सुंदरता का वर्णन कर पाना शायद मेरे लिए संभव ही नहीं, केवल महसूस ही किया जा सकता है।
इतने सुंदर बाग को देखकर मेरा मचलना स्वाभाविक ही था क्योंकि वास्तव में मैं ऐसी ही हूँ।
आदत के अनुसार भैया से कहा कि कॉलेज में स्टाफ से बात करके कुछ पौध ले चलते हैं । इस बात पर भैया तुरंत ही तैयार हो गए जबकि जब तक वो थे कभी भी एकबार में मेरे ऐसे किसी शौक के लिए हां नहीं करते थे हालांकि करते थे लेकिन मेरे गुस्सा हो जाने के बाद , पर अब तो खुद ही बाइक साइड में लगाकर स्टाफ से बात करने लगे कि हमें कुछ पौध चाहिए यहां से , उन्होंने तुरंत मना कर दिया ,फिर मैंने कहा पर हम तो खरीद कर लेंगे आप कीमत बता दीजिए इस बात पर वो तुरंत तैयार हो गए और पार्क का दरवाजा खुलवा दिया। हम उसमें से अपनी पसंद की पौध लेने लगे अब वहां पर अचानक ही भैया के एक दोस्त भी आ गए और उन्होंने एक ऐसा पौधा उखाड़ लिया जिसकी हमें आवश्यकता ही नहीं थी भैया ने तुरंत गुस्सा किया और पौधे को वापस उसकी जगह पर लगवाया।
अब इसी बीच स्टाफ के लोगों में भी एक होड़ सी लग गई पौध उखाड़ने की और हमारे तीन पौधों के सापेक्ष उन्होंने लगभग तीस पौधे उखाड़ लिए जिससे हमारा मन खिन्न हो गया और हम ऊपरी मन से धन्यवाद बोलकर अपनी बाइक से चल पड़े ।
आगे….
मैं बिस्तर में थी और हड़बड़ा कर बैठ गई इन्होंने पूछा क्या हुआ?? एक पल को तो मुझे कुछ याद ही नहीं रहा और मैंने कहा कुछ भी तो नहीं ,फिर अचानक बिजली सी कौंधी .. अरे…. सुनो मैंने अभी अभी भैया को देखा है सपने में पहली बार उनके जाने के बाद । ये बोले कि मैंने तो पहले ही कहा था कि वो तुम्हें जरूर दिखेंगे ।
मैं बैठकर वापस सारी कड़ियां जोड़ने में लग गई।
इस सपने की दो बातें पूर्णतः अप्रत्याशित और अकल्पनीय रहीं । एक तो वो पान की आकृति वाला खूबसूरत फल और दूसरा भैया का व्यवहार ,एकबार में ही मेरी इच्छा(शौक)के लिए हां कर देना , क्योंकि हम दोनों को तो हमेशा एक दूसरे को चिढ़ाने में ही मजा आता था पूरा बचपन इन्हीं लड़ाइयों में गुजरा और बड़ा होने के बाद मेरी डिक्टेटरशिप के वो आदी हो चुके थे । उन्हें पता था कि करुंगी तो मैं वही जो कह रही हूं तो बाद के दिनों में जब उनसे कहती कि एक काम करना है तो वो कहते है आज्ञा करिए महाराज , और मैं बड़े गर्व से उन्हें काम बता देती जो होना निश्चित था चाहे समय लग जाए।
पय अब क्या ये सब यादें हैं वो तो अनंत यात्रा पर निकल गए हैं जहाँ हमारी याद आएगी कि नहीं कोई नहीं जानता । बड़ा होने के बावजूद मैंने उन पर हुक्म चलाती रही हमेशा और वो मानते रहे। बचपन में जब वो विरोध करते तो मैं उन्हें डाँट पड़वा देती और जबरजस्ती मेरे मन की करनी पड़ती और बाद में उन्होंने शायद मान लिया दिया था कि ये छोटी है तो सही पर छोटी बनकर नहीं रहेगी इसलिए काफी समय से नाम लेने की जगह अक्सर बहन जी कह देते या जो हुक्म मेरे आका ।
जहाँ भी रहो आप खुश रहो प्रसन्न रहो । जो इस जीवन में भोगा वैसे जीवन की छाया भी आप पर न पड़े बस यही ऊपर वाले से दुआ है । ये तो पता है कि मुलाकात आगे भी होगी ही ,क्योंकि आत्मा के बंधन समाप्त नहीं होते हैं पर किस रूप में होगी ये तो कोई नहीं जान पाया है आज तक।

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