वृंदावन नीकौ

एक समय था जब मैं कुछ महीनों के लिए वृंदावन में रुकी थी या कह सकते हैं कि रुकना मजबूरी थी। ये वो समय था जब मैं भगवान और भक्ति में विश्वास तो रखती थी पर इससे संबंधित कर्मकांड मेरे नजरिए में पाखंड की श्रेणी में आते थे। क्षमा चाहूँगी क्योंकि मेरी ये सोच गलत थी पर तब शायद ये कमउम्र और नासमझी का असर रहा होगा।


अपनी इसी सोच के कारण वृंदावन में रहते हुए भी कभी किसी भी मंदिर में दर्शन को नहीं गई न ही वृंदावन की परिक्रमा के बारे में कुछ जानने का प्रयास ही किया। अध्ययन के लिए वहां थी और बस वही किया। बाद के वर्षों में भी वृंदावन जाना रहा तो बिहारी जी के दर्शन तक ही सीमित रहा क्योंकि बिहारी जी में माँ की असीम श्रद्धा के कारण वो अक्सर ही वहां जाया करती थीं तो मैं भी एक दो बार उनके साथ ही चली गई।
पिछले कुछ वर्षों में वृंदावन जाने की इच्छा तीव्र होने लगी और मकसद धार्मिक के साथ साथ वहां के बारे में छोटी छोटी जानकारी जुटाना भी था।
मार्च के महीने में तीन बार प्रोग्राम बना और अंत में किन्हीं कारणों से नहीं जा पाए।
अब अचानक ही 24 मार्च की छुट्टी का संदेश मिला तो मन मचल उठा वृंदावन जाने को। पर इसबार मार्च महीने का अंत होने के कारण प्रोग्राम फिर से टलने लगा । क्योंकि क्लोजिंग के समय में हमारे हमसफर किसी भी कीमत पर जा नहीं सकते थे साथ में। तो बस एक कड़ा फैसला ले लिया कि अब जाना ही है चाहे सोलो ही जाना पड़े।
पर कहते हैं न कि जहाँ चाह वहां राह । बस मेरे भाई को पता चला कि दीदी तो अकेले ही  जा रही हैं वृंदावन तो वह सपरिवार हो लिए मेरे साथ , अंधा क्या चाहे दो आँखें और यहां तो बिन माँगे सब मिल रहा था । तो हम पांच लोग निकल पड़े वृंदावन धाम की पावन यात्रा पर हालांकि समय का रोना अब भी था पर मन में लगन थी कि एक दिन में कुछ जगह तो घूम ही लेगें और बाकी की जगह अप्रैल में जाएंगे क्योंकि हमारे हमसफर ने अप्रैल में वृंदावन न केवल घूमने बल्कि वहां रुककर कुछ समय बिताने का भी वायदा कर दिया था।
तो हमारा प्लान था वृंदावन में लगे कुंभ मेले में जाना और वहां यमुना जी में स्नान करने के बाद बिहारी जी के दर्शन करना।
पर हम एक बात हमेशा से सुनते आए हैं कि भगवान के दर्शन उन्हीं की मर्जी से होते हैं हमारे चाहने या न चाहने से नहीं और यहां पर भी कुछ ऐसा ही हुआ । वृंदावन पहुंचकर अचानक ही प्रेममंदिर के दर्शन की आकांक्षा तीव्र हो गई तो भाई को बोला कि पहले उधर ही चलते हैं परिक्रमा बाद में करेंगे।
इस तरह हम प्रेममंदिर पहुंच गए।
ओह अवर्णनीय खूबसूरती की मिसाल हमारी आँखों के समक्ष थी । नजरें हर एक नजारे पर ठहरी जा रही थीं।
वन में विहार करती गाय,नृत्य करते मोर वंशी बजाते वंशीधर ,गोपियाँ …सब कुछ इतना सजीव कि विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि ये चित्रण है या हकीकत।
मंदिर प्रांगण में ही घंटों गुजर गए। मन मयूर स्वयं भी नृत्य कर रहा था वहां के नजारों के साथ।
लंबी लंबी वीडियोग्राफी और फोटोज का कलैक्शन अच्छा खासा हो जाने के बाबजूद मन नहीं भरा था।
पर समय की #सीमारेखा याद दिला रही थी कि अगर अब और लेट हुए तो भगवान के दर्शन नहीं हो पाएंगे । इसलिए आँखों को नजारों से घुमाकर प्रभु के द्वार की ओर घुमाया और मन को भी याद दिलाया कि यहां दर्शन को आए हैं सैर सपाटे को नहीं ।
पर मन भी क्या करे मंदिर के अंदर की आभा भी अवर्णनीय है । ऐसी आभा मंदिर और मूर्तियों की कि मेरे शब्द उनका वर्णन कर ही नहीं सकते , मंत्रमुग्ध अवस्था में दर्शन किए और मन को अफसोस भी हुआ कि इससे पहले यहां आने में इतना समय क्यों लगा दिया?
इसके बाद जब पट बंद होने लगे तो लगभग जबरजस्ती सभी भक्तजनों को प्रांगण से बाहर भेजा गया।
अब शुरू हुई वृदांवन परिक्रमा जो कि एक अवर्णनीय सुकून के साथ समाप्त हुई । पूरी यात्रा में भक्ति भाव और आनंद का मिलाजुला संगम रहा । बस यहां की परिक्रमा हमारे जैसे चश्मिश के लिए इसलिए कष्टकारी हो सकती है कि बिना चश्मे के नजारे नहीं दिखते और चश्मा लगा लिया तो किस क्षण बंदर ले जाएंगे आप अनुमान भी नहीं लगा सकते।
इसका एक वाकया शेयर कर रही हूं आपके साथ
रास्ते में बार बार चेतावनी दी जा रही थी चश्मा हटा लें नहीं तो बंदर ले जाएंगे तो सोचा चलो निकाल देते हैं इसे और परिक्रमा मार्ग पर आगे बढ़े , अब फोटोग्राफी का जुनून है तो वो तो करनी ही थी दूर एक बड़ा सा वृक्ष दिखा जो दूर से हमें तो सैमल (टेशू) लगा और उसपर खूबसूरत गुलाबी गुलाबी(लाल नहीं) बड़े से फूल लगे थे,तो लगे जी इसके फोटो लेने , बच्चों ने पूछा किसका फोटो लिया है आपने ?
तो जब हमने बताया कि सैमल है शायद दूर से ज्यादा समझ नहीं आ रहा तो ये सुनकर  वो जोर जोर से हँसने लगे।ध्यान दिया तो पीपल के वृक्ष पर गुलाबी बल्ब लगे थे अब बच्चों का मजाक बनाना तो लाजिमी ही था वो बेचारे क्या जानें एक चश्मिश का दर्द।
अब सोचा कि हम फिर से हँसी का पात्र नहीं बनेंगे और थोड़ा आगे चलकर अपनी जान और शान हमारे गॉगल -कम -चश्मे को हमने आँखों पर वापस स्थान दे दिया। पर ये तो बंदरों की शान में बड़ी गुस्ताखी हो गई और पलक झपकते ही एक बंदर आया और बड़ी ही फुर्ती से चश्मे को ले गया और हम देखते ही रह गए । बड़ी मुश्किल से एक स्थानीय व्यक्ति जो इसी परोपकार(धंधे) में लगे हैं वहां पर,ने  बंदर को फ्रूटी का पैक दिया और हमें हमारा चश्मा वापस मिल गया मात्र सौ रुपये की रिश्वत देकर।
यमुना जी के सहारे सहारे परिक्रमा मार्ग पर जब चल रहे थे तो सूर्यास्त होने को था नदी में सूर्यदेव की प्रतिछाया और आसमान में साक्षात सूर्यदेव , नदी में श्रद्धालुओं के द्वारा किये गये दीपदान की श्रंखला और नाव खेते नाविक सबकुछ अद्भुत अवर्णनीय।
यहां से लौटकर बिहारी जी के दर्शन किए, दर्शन क्यों बिहारी जी के साथ फूलों की होली खेली ।
बहुत सुना था बिहारी जी की फूलों की होली के बारे में पर कभी स्वयं भी साक्षी होंगे ऐसा सोचा नहीं था।
पूरी तरह से फूल और गुब्बारों से सुसज्जित मंदिर भीड़ इतनी कि बिना देखे कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता कि भीड़ इतनी भी हो सकती है, और ऊपर से रंग,गुलाल, फूलों की बरसात , इत्र की खुशबू , माहौल इतना हर्षोल्लास का था कि बस मन कर रहा था वहीं बस जाओ।
पर बाहर आना मजबूरी थी।
वृंदावन एकबार जाने के बाद मम्मी क्यों बारबार वहां जाती हैं अब तक अर्थात मम्मी की उम्र काफी अधिक होने के बाबजूद ये भी समझ आया । यहां आकर जो श्रद्धा और भक्ति मन में समाती है न उसके आगे जीवन भर की कमाई व्यर्थ ही नजर आती है और तब समझ आता है इस भजन का मर्म कि,

“सखी री मोहे लागै वृंदावन नीकौ
नीकौ नीकौ नीकौ……सखी री…..
नीकौ अर्थात मन को मोह लेने वाला

इसके बाद निधिवन , और वृंदावन के कुछ और भी मंदिरों के दर्शन किए जहां की श्रद्धालुओं के साथ खिलवाड़ जैसी घटनाओं ने मन को विचलित भी किया उनका वर्णन फिर कभी करुंगी।
निधिवन की कहानियों से तो सब परिचित होंगे ही उनके वर्णन के लिए अलग पोस्ट होगी।
बस यही कहूंगी कि वृंदावन एकबार जाने के बाद बार बार बिहारी जी बुलाएंगे जरूर।
नोट: वृंदावन जाने का सही समय नवबंर से मार्च तक होता है । वैसे श्रद्धालु सीजन नहीं देखते ।

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