शिकायत नहीं पर दर्द तो है

भगवान से नाराजगी का भाव बचपन से ही आता रहा है ,जब भी कुछ ऐसा होता जो मुझे पसंद नहीं तो मैं भगवान से नाराज हो जाती और कई कई दिन तक कोई पूजा पाठ न करती। फिर थोड़ा बड़े होने पर ऐसा करना कम कर दिया हालांकि बंद नहीं किया।

फिर 2011 में मेरी जिंदगी में ऐसा घटनाक्रम हुआ कि मैं एक बार फिर से भगवान से बहुत नाराज हो गई और इस बार तो मैंनें सभी मूर्ति/तस्वीर एक बैग में पैक करके बहुत अंदर दबा कर रख दी थीं । नाराजगी बहुत गहरी थी फिर एक दिन एक भैया घर पर आए उन्होंने देखा मंदिर के नाम पर घर में कुछ नहीं है जबकि वह बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के हैं तो उन्होंने इसका कारण पूछा। मैंने बता दिया कि मैं नाराज हूँ और मुझे कोई पूजा पाठ अब कभी नहीं करना । उन्होंने मुझे समझाया काफी सारे तर्क दिए और जब तक दिए जब तक कि मैं वापस मंदिर रखने को तैयार नहीं हो गई।

अब एक और चमत्कार हुआ। मैं मंदिर सजा पाती उससे पहले ही ट्रांसफर हो गया और शिफ्टिंग करनी पड़ी तो मैंने वो मूर्ति/तस्वीरों का बैग संभालकर गाड़ी में रखवा दिया खास हिदायत के साथ कि ये टूटनी नहीं चाहिए ।

शिफ्टिंग हो गई सामान भी पहुंच गया पर वो बैग /सामान नहीं निकला काफी ढूंढ़ा हर एक बैग को चैक किया पर बैग नहीं मिला।चोरी होने का गिरने का कोई मतलब ही नहीं था क्योंकि हर एक सामान सुरक्षित था।

बहुत ज्यादा सोचने के बाद मैंने मान लिया कि पहले मैं नाराज थी भगवान जी से और बाद में भगवान जी नाराज होकर रास्ते में ही कहीं उतर गए। मैंने और मूर्तियां ली और नए सिरे से मंदिर को सजाया अब तक मेरी नाराजगी भी दूर हो चुकी थी।

ये एक अलग किस्सा है पर भगवान से शुरू शिकायत के क्रम में याद आ गया।

आज जो मैं लिखने जा रही हूं वो बहुत ही ज्यादा द्रवित करने वाली बात है. मुझे यकीन नहीं हो रहा कि क्यों भगवान अच्छे लोगों के साथ इतना बुरा करता है।

आज से लगभग चार महीने पहले मेरे भाई का एक्सीडेंट हुआ था जिसके लगभग 25दिन बाद मेरे भाई की मृत्यु हो गई थी वेंटिलेटर पर ही।बिना कुछ बोले सुने ही वो चले गए।

इस मुश्किल घड़ी में जब मम्मी पापा जी बिल्कुल ही टूट चुके थे पूरे परिवार ने बहुत साथ निभाया खासकर , ताऊजी और उनके बच्चों ने अपने पराए का भेद ही खत्म कर दिया । तीनों भाई डायबिटिक होने के कारण स्वास्थ्य की दृष्टि से कमजोर होते हुए भी हर वक्त हर मदद के लिए तैयार खड़े रहे। एक तरह से घर की हर जिम्मेदारी ही अपने ऊपर ले ली ।उन्होंने जो किया उसका आभार कम से मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती । क्योंकि जो कुछ मैंने किया या बड़े भाई ने किया वो हमारा कर्तव्य बनता था पर उन्होंने जो किया वो परिवार के तौर पर एक मिसाल थी और रहेगी।

पर वाह रे ऊपर वाले उनकी अच्छाई भी काम न आई और मेरे तहेरे बड़े भाई को ये कोरोना की लहर खा गई। कोई कुछ नहीं कर सका । कहाँ हो भगवान नाराज होउँ कि नहीं ये भी सोच नहीं पा रही पर बहुत शिकायत है आपसे , ये नहीं होना चाहिए था । तीन महीने में परिवार पर दो बार वज्रपात ।हे भगवान क्या बीत रही है मेरे परिवार पर और मैं संबल भी नहीं दे सकती क्योंकि मैं तो स्वयं ही कोरोंटाइन हूँ। अब कौन धीरज बधांएगा मेरे बुजुर्ग माँ पापा को और ताई जी ताऊजी को। क्यों किया उनके साथ ऐसा। ताऊजी तो तब तक निवाला मुँह में नहीं देते थे जब तक कि तीनों भाई घर नहीं आ जाते थे। अब कभी तीनों साथ न होंगे।

सोच सोच कर भी दिमाग फट रहा है क्या बीत रही होगी उनके बच्चों पर और भाभीजी उन्हें तो अभी कुछ पता ही नहीं है वो खुद जिंदगी की जंग लड़ रही हैं । बस भगवान उन्हें अब ठीक कर देना। अब और क्रंदन नहीं । नहीं बची है शक्ति मेरे परिवारजनों में अब और दुख सहन करने की।

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