नन्हा मेहमान

आज मन बहुत उदास है, धीरे धीरे शाम भी ढल गई, रात के दस बजने को हैं ,पर वो अभी तक नहीं आई है,और अब शायद कभी आएगी भी नहीं ,क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि शाम के छः बजते बजते वो आ नहीं गई हो । कल रात बहुत तेज आँधी के साथ बारिश और ओले भी पड़े थे । ऐसा तो पहले भी कई बार हुआ था पर वो आँधी तूफान शांत होते ही अपनी जगह पर आकर बैठ जाती थी। पर आज ऐसा नहीं हुआ ,मन में बुरे बुरे खयाल आ रहे हैं, पर एक उम्मीद भी है कि नहीं सालभर का साथ यूं पलभर में खत्म नहीं हो सकता ,पर शायद ये हो चुका था।

मेरे घर पर एक पुराना गुड़हल का पौधा लगा था जो कई वर्ष का हो जाने के कारण छोटे से पेड़ की तरह हो गया था। एक दिन मैं जरा देर से घर लौटी तो मेरी निगाह अनायास ही उस पौधे पर गई, कुछ गोल गोल सा रुई का सा गोला, एक डाली में फँसा सा नजर आ रहा था ,ध्यान से देखा तो कुछ स्पंदन महसूस हुआ। एक नन्ही सी चिड़िया चोंच पंखों में छुपाकर बैठी थी । जिससे वह गोल गेंदनुमा दिख रही थी।मेरे जैसा प्रकृति प्रेमी, और घर के आँगन में चिड़िया का रैनबसेरा ,मारे खुशी के फूली न समा रही थी। जल्दी से मोबाइल निकाला कि कहीं चिड़िया उड़ न जाए कम से कम एक फोटो तो क्लिक कर लूं।

पहला फोटो थोड़ा दूर से लिया, फिर थोड़ा पास उसके बाद और पास से (केवल आठ इंच की दूरी से ), कई फोटो क्लिक करने के बाद भी चिड़िया थोड़ी सहमी हुई तो थी ,पर उड़कर कहीं नहीं गई।

अंदर आकर इन्हें बताया तो बोले हां एक चिड़िया दिखती तो है शाम को। निर्मोही आदमी,मैंने मन में कहा। चिड़िया दिखती है,कम से कम मुझे बताया तो होता। चिड़िया का वहां बैठना इनके लिए साधारण सी बात थी मेरे लिए नहीं, मैं कितना प्रफुल्लित थी शब्दों में बयां करना मुश्किल है। ।

अब तो हर शाम को उसके आने का इंतजार होता ,वो लगभग पाँच से छः के बीच आकर अपनी एक निश्चित डाल पर बैठ जाती और सुबह चार बजे के करीब चली जाती ,दिनभर इधर उधर फुदकती रहती पर गुड़हल पर न आती बस रात का स्थाई निवास था वहां पर उसका।

शाम के बाद चाहे जितना ट्रैफिक का शोर होता रहे वो निश्चिंत अपनी जगह पर बैठी रहती, क्योंकि पौधा मुख्य दरवाजे से लगा हुआ था जहाँ शाम को ट्रैफिक ज्यादा निकलता है।।अब तो मैं उसकी छोटी छोटी वीडियो बनातीऔर प्रियजनों को भी भेज देती, कभी ऐसे ही उसे देखती रहती । उसे देखना मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया था। कभी आँधी तूफान आता भी तो वो उड़कर पता नहीं कहाँ चली जाती लेकिन , बारिश थमते ही वापस अपनी जगह पर आकर बैठ जाती।एक दिन मैं पौधों की छँटाई कर रही थी कि गलती से मुझसे वही डाली टूट गई जिस पर उसका स्थाई बसेरा था। मेरा मन बहुत खराब हो गया ,बार बार अपने आप को कोस रही थी कि एक काम ध्यान से नहीं होता मुझसे अब वो चिड़िया आएगी और वापस लौट जाएगी क्योंकि पिछले लगभग छः महीने में उसने एक भी दिन अपनी जगह बदली नहीं थी।

अब तो बस शाम का इंतजार था जब वो आएगी और फिर हमेशा के लिए वापस लौट जाएगी।

शाम हुई और वो आ गई , पौधे पर मँडराने लगी और वापस लौट गई ,वही हुआ जिसका डर था। पर कुछ ही मिनट में वो वापस आ गई और एक सुरक्षित सी जगह देख कर वहां बैठ गई। पिछले लगभग छः महीने से अब वो वहीं बैठ रही थी ।

इतने लंबे समय में भी मेरी उत्सुकता उसके प्रति बिल्कुल भी कम नहीं हुई थी।

पर आज रात के दस बजने को हैं वो नहीं आई।

अगले दिन भी इंतजार खत्म न हुआ  पर वो वापस नहीं आई । वो जरूर उस रात को तूफान में अपनी जान नहीं बचा पाई होगी ।

कुछ समय बाद गुड़हल भी धीरे धीरे मुरझाने लगा। कीटनाशक का छिड़काव भी किया खाद पानी सबकुछ पर वो हरा नहीं हुआ सूखता ही चला गया। शायद वह भी दुखी हो अपना साथी खो देने के कारण या उसका सूखना एक संयोग मात्र ही था।पर वो सूख गया।उस सूखे हुए पौधे को मैंने चार महीने वैसे ही लगा रहने दिया इस उम्मीद में कि शायद वो फिर से हरा हो जाए क्योंकि कहते हैं कि गुड़हल एकबार हो जाए तो जल्दी सूखता नहीं है विपरीत परिस्थितियों में भी बना रहता है।पर जब वो बिल्कुल सूखकर लकड़ी हो गया तो उसे हटाकर वहां दूसरा पौधा गुड़हल का लगा दिया । उस पर भी फूल आने लगे हैं ,पर किसी चिड़िया ने उसे अब तक अपना रैनबसेरा नहीं बनाया है।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s